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मिथिलांचल का प्रसिद्ध पर्व चौरचन (चौठचन्द्र ) आज, व्रती देगी शाम को भगवान चंद्रदेव को अर्घ्य

जागरण न्यूज़ एक्सप्रेस/मधुबनी/बिंदेश्वर चौधरी। अंधराठाढ़ी परिक्षेत्र में बुधवार को मिथिलांचल का एक प्रसिद्ध पर्व चौठचन्द्र धूमधाम से मनाया गया। भादो मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की रात में यह पर्व मनाया जाता है।

चौठचन्द्र को मिथिला में चौरचन पर्व भी कहा जाता है। प्रायः सभी हिन्दू परिवारों में यह पर्व मनाया जाता है। मालती देवी, ज्योति देवी, बबिता देवी, गुलाब देवी, सुशीला देवी, रेमनी देवी समेत दर्जनों व्रती महिलाओं ने बताया कि वे लोग इस दिन भगवान गणेश और चंद्रदेव की पूजा करती हैं। प्रायः घर की बुजुर्ग महिला इस व्रत को करती हैं और शाम को भगवान चंद्रदेव को अर्घ्य देती हैं।

माना जाता है कि यह पूजा के करने से भगवान चंद्रदेव प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन घर में भगवान को प्रसाद चढ़ाने के लिए परंपरागत तरह तरह के व्यंजन भी बनाए जाते हैं। पुलुकिया, खजुरिया, पुड़ी उजले रंग के फल-फूल, दूध, दही, खीर और विभिन्न सामग्रियों से भगवान की पूजा की जाती है।

वही हाथों में केला लेकर ही पूजा के बाद चन्द्रमा को देखने और प्रणाम करने का बिधान है। कुछ ब्रती पुरोहित के मंत्रोच्चार के साथ चन्द्रमा को अर्घ्य देती है। एक पुरोहित ने इस पर्व की पृष्ठ भूमि बताते हुए कहा कि यह पूजा भगवान गणेश और चंद्रदेव के बीच एक प्रसंग पर आधारित है।

शास्त्रों में वर्णित इस प्रसंग में अपने सौंदर्य के अभिमान में चूर चंद्रदेव एक बार भगवान गणेश के मुख का उपहास उड़ा देते हैं। इससे क्रोध में भगवान गणेश चंद्रदेव को श्राप दे देते हैं। बाद में देवताओं के कहने पर चंद्रदेव भगवान गणेश की पूजा करते हैं। इससे प्रसन्न होकर भगवान गणेश चंद्रदेव को आशीर्वाद देते हैं। वह चंद्रदेव से कहते है कि भादव शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को एक खास मंत्र के उच्चारण के साथ जो भी उनका दर्शन करेगा उसका जीवन निष्कलंक होगा। उसी दिन से पूरे मिथिलांचल में चौरचन मनाने की परंपरा चली आ रही है।

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