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भगवान से पहले गुरु….

कैलाश गुप्ता, संपादक 

भगवान से पहले गुरु का नाम लिया जाता है. कहते हैं कि एक गुरू के बिना किसी भी लक्ष्य तक पहुंच पाना संभव नहीं है. गुरु ही आपको जिंदगी जीने का तरीका और उसमें आने वाली मुश्किलों से लड़ने के बारे में बताता है. यही वजह है कि सैकड़ों साल पहले की कई कहानियां ऐसी हैं जिनमें गुरु और शिष्य के रिश्ते को बड़ी ही खूबसूरती से बयां किया गया है. सबसे बड़ा उदारहरण इकलव्य का है जिसने अपने गुरु द्रोणाचार्य को अपना अंगूठा गुरु दक्षिणा के तौर पर दे दिया था. यही वजह है कि भगवान से पहले गुरु का नाम लिया जाता है.

कवि कबीर दास जी ने कहा था-

गुरु गोबोंद दौऊ खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोबिंद दियो मिलाय”                         

इसके अर्थ में काबिर दास जी ने समझाया है की जब गुरु और भगवान दोनों खड़े हैं तो इंसान दुविधा में पड़ जाता है की आगे किसका चरण स्पर्श करूँ तब कबीर दास जी बताते हैं की आगे गुरु का चरण स्पर्श करना चाहिए क्यूंकि ये वही गुरु है जो तुमको भगवान तक पहुँचने का रास्ता दिखाया हैं. बिना गुरु के ज्ञान के हम भगवान् तक कैसे पहुँच पाते?  इसलिए हमें सबसे पहले अपने गुरु का सम्मान करना चाहिए.

गौरतलब है कि जहाँ पहले गुरु हुआ करते थे वहीं आज उनकी जगह शिक्षक होते हैं. जो स्कूल से लेकर कॉलेज तक अपने छात्रों को हर वह शिक्षा देते हैं जो उन्हें समाज में और उनके करियर में बुलंदियों तक पहुंचाने के काम आती है. एक शिक्षक जलता हुआ दीपक है जो खुद जलकर दूसरों की जिंदगियों में उजाला भरते हैं. वे अपना पूरा जीवन हमें अच्छा ज्ञान और सही रास्ता दिखने में लगा देते हैं.

गुरु हमेशा हमें सफल होने का रास्ता दिखाते हैं और हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं. वे हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनने में हमारी मदद करते हैं. शिक्षकों का हमारे जीवन में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है. हमारे जिंदगी को एक सही आकार देने में हमारे शिक्षकों का सबसे बड़ा हाथ होता है. हमारे माता पिता के बाद हमारे गुरु या शिक्षक ही हमारे मार्ग दर्शक हैं. इसीलिए हम आज जो भी हैं सब हमारे शिक्षक के बताये हुए मार्ग दर्शन के जरिये बनें हैं. एक शिक्षक हमें सही और गलत का परख करना सिखाते हैं.

वैसे तो आज जब हर चीज सोशल मीडिया पर आ चुकी है, तो शिक्षक दिवस कैसे अछूता रह सकता है. स्कूल जाने से पहले या अपने शिक्षक से मिलने से पहले उन्हें सोशल मीडिया पर मैसेज लिखकर टैग कर दिया जाता है. कई छात्र गूगल का सहारा लेकर किसी इमेज या फिर इलस्ट्रेशन के जरिए टीचर्स डे विश करते हैं. टीचर्स डे के कुछ दिन पहले से यह माहौल सोशल मीडिया पर दिखना शुरू हो जाता है. इसका एक फायदा उन छात्रों को भी होता है जो स्कूल या कॉलेज से पास आउट हो चुके हैं. वे अपने शिक्षकों को सोशल मीडिया के जरिए इस खास दिन की बधाई देते हैं और खुद के जीवन में उनके योगदान को भी बयां करते हैं.

 

शिक्षक दिवस

डा. सर्वपल्‍ली राधा कृष्णन एक शिक्षक और भारत के दूसरे राष्ट्रपति के जन्मदिन 5 सितंबर के दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है. शिक्षक दिवस हमारे लिए बहुत महत्व रखता है क्यूंकि इस दिन हम अपने शिक्षकों को बता सकते हैं की उनका अनमोल योगदान हमारे जीवन में क्या महत्व रखता है. इस दिन शिक्षकों और छात्रों का रिश्ता और भी मजबूत और गहरा बन पता है. उनके प्रति हम हमारे भावनाओं को बता सकते हैं. हमारे मन में अपने शिक्षकों के प्रति जो प्यार और सम्मान है ये हम शिक्षक दिवस पर दिखा सकतें हैं.

डा. सर्वपल्‍ली राधा कृष्णन

डा. सर्वपल्‍ली राधा कृष्णन भारत के दूसरे राष्ट्रपति और वे एक शिक्षक भी थे. वह पूरी दुनिया को ही स्कूल मानते थे, उनका कहना था कि जहाँ कहीं से भी कुछ सीखने को मिले उसे अपने जीवन में उतार लेना चाहिए. वह पढ़ाने से ज्यादा छात्रों के बौद्धिक विकास पर जोर देने की बात करते थे. वह पढ़ाई के दौरान काफी खुशनुमा माहौल बनाकर रखते थे. वे खुद एक बहुत बड़े शिक्षक थे और इसीलिए वे चाहते थे कि उनके जन्म दिन को पुरे भारत के सभी शिक्षकों के नाम से जाना जाये. उन सभी शिक्षकों को सम्मान दिया जाये और उन्हें ये एहसास कराया जाये की उनका हमारे जीवन में क्या महत्व है.

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के सबसे पहले उपराष्ट्रपति और द्वित्य राष्ट्रपति बने थे, शिक्षा व शिक्षक के प्रति उनका बहुत गहरा सोच और विश्वास था. वो एक प्रसिद राजनयिक, विद्वान थे. वो भारत के सभी शिक्षकों के लिए एक बहुत बड़ा मिसाल बने. जब डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के द्वित्य राष्ट्रपति बने थे. सन 1954 में उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया. (1962 to 1967) तब उनके कई दोस्तों और स्टूडेंट्स ने उनसे अनुरोध किया की वे उन्हें अनुमति दें की वे 5 सितम्बर को उनका जन्मदिन मनायें, जिसपर डॉ. राधाकृष्णन ने उन्हें कहा था कि ये ख़ास मेरे जन्मदिन मानाने से ज्यादा खुश और गर्व मै महसूस करूँगा अगर इस दिन को पुरे भारत के शिक्षकों के लिए शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जायेगा. और तभी यानि सन 1962 से हर साल 5 सितम्बर  को डॉ. राधाकृष्णन के जयंती के अवसर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा.

 

 

 

 

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